21 फरवरी ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, इस बात का पता एनडीटीवी में रवीश कुमार के प्राईम टाईम कार्यक्रम से चल पाया। कार्यक्रम में आज से एक सौ पचास वर्ष पहले अपने देश के बिहार और पूर्वी उतर प्रदेश से जबरन ले जाकर सूरीनाम में बसाये गए मजदूर, जो गिरमिटिया मजदूर के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनके वंशजों में से एक राज मोहन को भोजपुरी में गाते हुए दिखाया गया। कार्यक्रम को देखकर बहुत अच्छा लगा। क्योंकि राजमोहन ने हिन्दी में बात करते हुए बताया कि सूरीनाम में 150 साल बाद आज भी भोजपुरी चलती है और हिन्दी तो वहां की बोली जाने वाली एक महत्वपूर्ण भाषा है। इसलिए इसी बहाने लाहौल-स्पिती ज़िले से परिचय करवाना चाहता हूं जहां पर दो महान भाषा परिवारों संस्कृत (प्राचीन भारतीय आर्य) तथा भोटी (तिब्बती-बर्मी) की नौ भाषाएं बोली जाती हैं, जो अपने आप में हैरान कर देने वाली बात है।

भाषा क्योंकि आपसी सम्पर्क, सम्प्रेषण तथा अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं एक साधन भी है। यह न सिर्फ मनुष्यों के लिए अपितु समस्त जीव जगत के लिए भी अनिवार्य है। क्योंकि समस्त प्राणी सदा ही एक दूसरे के सम्पर्क और सहचर्य में रहते हैं और जो उनकी आवश्यकता भी है। चाहे सुरक्षा की दृष्टि से हो या फिर सुविधा के लिए हो, जीव जगत को एक समाज की आवश्यकता रहती है और समाज को सम्पर्क एवं अभिव्यक्ति के माध्यम व साधन की। जीव जगत धर्म के बिना रह सकता है लेकिन भाषा के बिना रह पाना संदिग्ध है। चाहे पशु, पक्षी या फिर मनुष्य सब को एक दूसरे से सम्पर्क, सम्प्रेषण तथा अभिव्यक्ति के लिए माध्यम व साधन की जरूरत रहती है। उसी जरूरत के चलते संकेतों आदि समेत अनेकों माध्यमों व साधनों के आविष्कार हुए और लम्बे संघर्ष के उपरांत मनुष्य आज भाषा के इस स्तर तक पहुंचा है। प्रबल सम्भावना इस बात की भी है कि भविष्य में मानव किसी अन्य माध्यम का आविष्कार कर ले। जैसे कि ‘आर्टिफिशल इंटेलिजेंस’ आदि। यहां एक अन्य बात सांझा करना चाहता हूं और वह है, धर्म राष्ट्र का निर्माण नहीं करता, जबकि भाषा कर सकती है। इस बात का एक प्रमाण है स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद देश में भाषाओं के आधार पर राज्यों का गठन किया जाना। साथ ही साथ देश के संविधान में भी अनु. 343 से 351 तक 11 अनुच्छेदों का एक अलग भाग भाषाओं के लिये दिया गया है। जिसमें ‘राज भाषा’, संविधान कि 8वीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं तथा अन्य भाषाओं के बारे प्रावधान किए गए हैं। इसी के साथ प्रांतीय, क्षेत्रीय छोटी भाषाओं और भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए भी विशेष व्यवस्था करने के प्रावधान किये गये हैं।

भारत की भाषाएं छ: अलग-2 भाषा-परिवारों का प्रतिनिधित्व करती हैं। सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा 1903-23 किए गए भाषा सर्वेक्षण में 179 भाषाएं तथा 544 बोलियों को मान्यता दी गई थी। जो 1921 में घट कर क्रमश: 188 तथा 49 हो गई। स्वतन्त्रता के पश्चात देश में भाषायी आधार पर प्रान्तों का गठन किया गया। 1971 की जनगणना में भाषाओं का वर्गीकरण हुआ, पहले वर्ग में वे भाषाएं आईं जो संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित थी और 10,000 से अधिक लोगों द्वारा बोली जाती थी, दूसरे वर्ग में ‘अन्य भाषाएं’ डाली गई जिनके बोलने वाले 10,000 से कम थे। लेकिन भारत को एक भाषा-परिवार ‘भारोपीय’ का सिद्ध किए जाने का प्रयास भी लगातार किया जाता रहा है। जो कि अभी-2 एनसीआरटीई द्वारा दक्षिण भारतीय भाषाओं के मामले में किये जाने के प्रयास से स्पष्ट है। हाल में यानि कि देश में राष्ट्रवाद के उभार के बाद देश के शिक्षा अनुसंधान व प्रशिक्षण के सबसे बड़े संस्थान एनसीईआरटी ने ‘भारतीय भाषाओं में एकात्मकता’ शीर्षक से भारतीय भाषाओं में अंतर्संबंधों को लेकर एक अध्ययन शुरू किया है। इस अध्ययन ने दक्षिण भारत की चार भाषाओं के 1500 ऐसे शब्द खोजने का दावा किया है जो अर्थ, ध्वनि, प्रत्यय और उपसर्ग के आधार पर देश की सभी भाषाओं में लगभग समान व एक सा अर्थ रखते हैं।

क्षेत्रफल के लिहाज से हिमाचल प्रदेश का सबसे बड़ा और जनसंख्या के हिसाब से सबसे छोटा ज़िला लाहौल-स्पिति, प्रदेश के अन्य क्षेत्रों से कई अर्थों में अलग, अदभुत, निराला एवं अनोखा है। यह महान हिमालय पर्वत क्षृंखला के मध्य में स्थित है। कुछ क्षेत्र ठंडे मरुस्थल में तो कुछ समशीतोष्ण कटिबन्ध में। ज़िले का सम्पूर्ण स्पिति तथा लाहौल का कुछ क्षेत्र जहां ठंडे मरुस्थल क्षेत्र में पड़ता है वहीं पर लाहौल का नीचे वाला क्षेत्र जिसमें चंद्रभागा (पट्टन, चङ्सा, रेबक) घाटी का पुराने हिमाचल वाला क्षेत्र भी शामिल है, समशीतोष्ण क्षेत्र में आता है। पूर्व में सुमदो से उतर में दारचा (छिका-ररिक) से पश्चिम में काडू नाला तक इसका क्षेत्रफल 13833 वर्ग किलोमीटर तथा 2011 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या 31564 है और जनसंख्या का घनत्व मात्र 2.3 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इस ज़िले की सीमा एक तरफ चीन (तिब्बत), दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर के लद्दाख और तीसरी तरफ हिमाचल प्रदेश के चंबा, कांगड़ा तथा कुल्लू जिलों से लगती हैं। साफ तौर पर आर्य एवं मंगोल दो अलग-2 प्रजातियों के लोगों का निवास है, तो कई संस्कृतियों का सम्मिलन है। क्षेत्र की 60% जनसंख्या बुद्ध धर्म अनुयायियों की है तो 39% हिंदुओं की शेष 1% ईसाई व अन्य हैं।

यहां पर प्राचीन भारतीय आर्य (संस्कृत) और तिब्बती-बर्मी (भोटी), दो परिवार की नौ भाषाएं बोली जाती हैं। संस्कृत परिवार की भाषाओं में चिनलभाशे, ल्वहरभाशे तथा पंगवाली है। जो सिर्फ लाहौल घाटी में ही बोली जाती हैं। जिनमें चिनलभाशे और ल्वहरभाशे लाहौल में चंद्रा घाटी के सिस्सू, गौंधला, गाहर तथा स्तोद के जिस्पा और चंद्रभागा (पट्टन) घाटी के मड़ग्रां गांव तक दो भिन्न जातियों के लोगों द्वारा बोली जाती हैं। जहां तक बात पंगवाली भाषा की है वह सिर्फ पांगी के साथ लगने वाले एक गांव तिन्दी में बोली जाती है। यहां पर एक अन्य बात महत्वपूर्ण है और वह है चिनलभाशे और ल्वहरभाशे के बारे में। ये भाषाएं पूरे लाहौल में बोली जाती हैं, यद्यपि कुछ ही गांवों में इन भाषाओं के बोलने वालों का अस्तित्व है उनमें भी कुछ गांवों में तो एक-2, दो-2 ही परिवार हैं। उन गांवों की अधिक आबादी तिब्बती-बर्मी (भोटी) परिवार की भाषाएं बोलने वाली है, लेकिन इन अल्पसंख्यक लोगों ने अपनी भाषा की पहचान बनाए रखी है जो एक अन्य महत्वपूर्ण व आश्चर्यजनक बात है।

इस क्षेत्र यानि लाहौल-स्पिति की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है स्पिति या पितिकद जो इसे बोलने वाले बोलते हैं। यह भाषा सम्पूर्ण स्पिति घाटी की तेरह पंचायतों में बोली जाती है। लाहौल की भाषाओं के बोलने वालों की संख्यानुसार तिब्बती-बर्मी परिवार की सबसे बड़ी भाषा है मनचढ़/पट्टनी या चङसोभाशे, जिसे आगे ‘बोदभाशे’ तथा ‘स्वङभाशे’ में बांटा जा सकता है। यह भाषा मूलिंग से तिन्दी तक बोली जाती है और जो लाहौल की सबसे अधिक समझी व बोली जाने वाली भाषा भी है। दूसरी भाषा है पुनन/गाहरी या जिसे इस भाषा को बोलने वाले ‘एरङकद’ कहते हैं जो गाहर या केलंग की घाटी की चार पंचायतों में बोली जाती है। तीसरी भाषा है स्तोद, या तोदकद जो केलंग से आगे दो पंचायतों में बोली जाती है। चौथी भाषा है चंद्रा घाटी की जिसे तिननी या तिननकद कहते हैं यह चंद्रा घाटी के तीन पंचायतों में बोली जाती है।

इस ज़िले में बोली जाने वाली भाषाओं के साथ एक बहुत बड़ा अन्याय यह भी हुआ है कि उनका नामकरण क्षेत्र से बाहर के विद्वानो द्वारा अपने तरीके से किया गया है। जोकि पूर्ण ज्ञान के अभाव तथा आधी-अधूरी सूचनाओं पर आधारित था और हर भाषा के बारे में गलत है। उन विद्वानों ने आम तौर पर निकट की भाषाओं के नामकरण की पद्धति को अपनाते हुए इस क्षेत्र की भाषों के नाम डाल दिये। नामकरण की इस पद्धति या पेटर्न के अनुसार संस्कृत परिवार की भाषाओं के नामकरण के लिए क्षेत्र या निवासियों के नाम के पीछे ‘ई’ उपसर्ग लगा दिया जाता है; जैसे कुल्लू की कुल्लुई आदि। जो कि न तो उसके अर्थ को पूरा करते हैं और न ही उस भाषा के बोलने वालों के द्वारा दिये गए नामों से मेल खाते हैं। दुर्भाग्य से यह सब आज तक भी चल ही रहा है। इसके कारण एक तो इनको बोलने वालों की आबादी का कम होना। दूसरे दो भाषा परिवारों की भाषाओं का आपसी प्रभाव एवं सम्मिलन। तीसरा इन भाषाओं में लिखित  साहित्य का अभाव तथा अंतिम व सबसे महत्वपूर्ण आज के दौर का व्यवसायिक दबाब हैं। लेकिन आज जब लोग शिक्षित हो रहे हैं और बाहरी दुनियां के अधिक संपर्क में आ रहे हैं तो इस प्रकार के प्रश्न उठाये जाने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इन भाषाओं के बोलने वालों में सबका ही यह कहना है कि उनकी भाषा का  नाम वह ‘नहीं’ है जो रिकार्डों में दर्ज हैं। इसके अतिरिक्त भी उनका यह भी मानना है कि भाषा का नाम वही होना चाहिए जो उसे बोलने वाले प्रयोग करते हैं। इसलिए यहां पर भाषाओं के नामों को वही दिया गया है जो उनके बोलने वालों ने दे रखा है।

अध्ययन के दौरान एक बात तो साफ उभर कर आई कि भाषाओं का नामकरण क्षेत्र या प्रजाति के आधार व स्थापित आधार पर नहीं होना चाहिए। बल्कि यह उस भाषा के बोलने वालों के द्वारा दिये गए नाम के आधार पर होना चाहिए। लाहौल-स्पिति के मामले में भी भाषाओं के नामकरण की पद्धति को क्षेत्र में प्रचलित पद्धति से समझौता करना पड़ेगा। क्योंकि बोलने वाले नाम देने के अधिकारी होने चाहिए। लेकिन मुझे लगता है भाषा के नाम के विषय में महत्वपूर्ण वह नहीं है जो कुछ दिन के अध्ययन या सर्वेक्षण के बाद अपनी मर्जी से दिया गया हो, बल्कि महत्वपूर्ण वह है जो उस भाषा को बोलने वाले उसे बोलते हैं। यह एक व्यक्ति और समुदाय की पहचान और अस्तित्व का प्रश्न है इसलिए भाषा के नामकरण से पहले उस भाषा को बोलने वालों की राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

संस्कृत-जर्मन भाषा विवाद के दौरान मैंने दिनांक 21.4.2015 को भारत सरकार की तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को एक खुला पत्र लिखा था जिसमें मैंने कहा था, ‘मेरे जैसों को मातृभाषा सहित नौ भाषा/बोलियां सीखने के बावजूद न तो एक भाषा पर अधिकार हो पाता है और न ही उसका कोई लाभ मिला पाता है। जबकि मात्र एक भाषा सीखने-बोलने वाला एक परजीवी वर्ग पूरे देश के मैदानों को चरता है और देश का सबसे बड़ा बुद्धिजीवी होने का प्रमाणपत्र भी पाता है। सिर्फ एक भाषा सीख कर मौज करना तो इस देश की एक एतिहासिक सच्चाई रही है और परंपरा भी। इस देश में संस्कृत के नाम पर एक अभिजात्य वर्ग स्थापित हुआ था और सदियों से जिसने सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक तौर पर देश पर एकाधिकार बनाए रखा, आज वही काम अंग्रेज़ी वाला कर रहा है। अब फिर वातावरण को संस्कृतमय बनाने का सरकार द्वारा भरपूर प्रयास किए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह दुनियां की सबसे पुरानी, समृद्ध और आसान भाषा है। आने वाले समय में शायद इस के साथ देशभक्ति का तत्व भी जोड़ दिया जाये। यह है कुछ लोगों द्वारा अपना वर्चस्व बनाए रखने का सफलतम प्रयास का उदाहरण, जो दुनियां में दुर्लभतम है।’

लाहौल-स्पिति की भाषाओं के नामकरण में इन भाषाओं के बोलने वालों द्वारा तीन पद्धतियां अपनाई गई, लगती हैं। पहली पद्धति में प्रदेश की संस्कृत परिवार की दूसरी भाषाओं की तरह क्षेत्र व निवासियों के नाम के अन्त में ‘ई’ प्रत्यय जोड़कर (पंगवाल+ई=पंगवाली) किया गया है, यह पंगवाली भाषा के मामले में सही है। दूसरी पद्धति के अनुसार संस्कृत (प्राचीन भारतीय आर्य) परिवार की भाषा की भाषाओं चिनलभाशे और ल्वहरभाशे के मामले में यह जातियों के नामों के अन्त में ‘भाशे’ (चिनाल+भाशे) तथा (ल्वहर+भाशे) प्रत्यय जोड़ कर क्रमश: चिनलभाशे तथा ल्वहरभाशे किया गया है। इसके अतिरिक्त चंद्रभागा (पट्टन) घाटी की मुख्य भाषा चङसोभाशे तथा उसकी दो शाखा भाषाओं बोदभाशे तथा स्वङभाशे के मामले में भी इसी पद्धति को अपनाया गया है, प्रजातियों के नामों के अन्त में भाशे जोड़ कर (बोद+भाशे) व (स्वङ(ला)+भाशे) बोदभाशे और स्वङभाशे। तीसरी पद्धति में भोटी या तिब्बती-बर्मी परिवार की भाषाओं तिननकद, एरङकद, तोदकद तथा पितिकद के मामले में क्षेत्रों के नामों के अन्त में ‘कद’ प्रत्यय जोड़ कर, (तिनन+कद), (एरङ+कद), (तोद+कद) व (पिति+कद) से क्रमश: तिननकद, एरङकद, तोदकद और पितिकद किया गया है।

अन्य क्षेत्रों की तरह ही भाषा के क्षेत्र में भी भाषा की संभाल, निकट संपर्क यहां तक भावनात्मक जुड़ाव पर सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक पृष्ठभूमि और परिवेश का प्रभाव पड़ता है। मनुष्य जैसे-2 आर्थिक, शैक्षिक व सामाजिक क्षेत्र में प्रगति करता है वैसे उसका नज़रिया एकल होता जाता है। वह अधिक से अधिक अपने बारे में सोचता है। सामाजिकता की कमी आती जाती है और वह अपने मूल, अपनी संस्कृति, भाषा, पहरावा, खाना-पीना, उठना-बैठना से दूर होता जाता है। एक समय ऐसा आता है जब उसके अंदर इस प्रकार की यादें कम ही बची रहती हैं। यह भी ठीक है कि विशेषकर शिक्षा या ज्ञान की वृद्धि के साथ-2 जहां एक ओर कुछ क्षेत्रों के बारे में उसकी सोच खुली होती जाती है वहीं कुछ चीजों पर संकुचित भी हो जाती है।

लाहौल-स्पिती की दो भाषा परिवार की भाषाओं के एक दूसरे पर प्रभाव तथा सम्मिलन के कारण एक नई स्थिति पैदा हुई लगती है। इस क्षेत्र की नौ भाषाओं के शब्दों के सही उच्चारण, ध्वनि, लेखन एवं व्यवहार में कुछ समस्याएं आ रही हैं। शब्दों के लेखन में देवनागरी और भोटी (बौद्धयिक) लिपि पूर्णरूप से स्पोर्ट नहीं करती। इसलिए लेखन और उच्चारण में अंतर पड़ता है। कुछ शब्दों के लिए वर्ण भी अपर्याप्त हैं।

हर चीज की तरह भाषा पर भी अत्यधिक दबाव हैं। उन दबावों में सबसे बड़ा दबाव तो तथाकथित विकास व व्यवसायिकरण है। जिसके चलते अन्य कई घटकों की तरह भाषाओं का अस्तित्व भी समाप्त होता जा रहा है। सभ्यता के आरम्भ से आज तक मानव समाज ने अभिव्यक्ति के लिए संकेतों समेत जितने साधनों व माध्यमों को अपनाया है उनमें भाषा एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसी के द्वारा मनुष्य अपनी हर प्रकार की विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचा पाया है। लेकिन आज उसी माध्यम के अस्तित्व पर महान संकट आन पड़ा है। बहुत सी भाषाएं तो विलुप्त हो चुकी हैं और जो बची हैं उनका बाजूद भी खतरे में है।

आज़ मानव प्रजाति की भाषायी विरासत का बड़ा भाग विलुप्ति के कगार पर है। भाषाक्षति, भाषा परिवर्तन या भाषा विरासत में गिरावट और भाषाओं के विलुप्त होने के कारणों में सबसे बड़ा कारण है आज का विकास का शोर है। जिसके कारण हर चीज का व्यवसायिकरण हो गया है। हर व्यक्ति अपने बच्चों को अंतर्राष्ट्रीय भाषा में ही शिक्षित करना चाहता है जिसका शिक्षा के प्राथमिक स्तर तक प्रभाव पड़ा है जो भाषा और मातृभाषा को भी प्रभावित करता है जिसका परिणाम उस भाषा के चलन में कमी और अंत में विलुप्ति। कुछ अनुमानों के अनुसार 22वीं शताब्दी तक वर्तमान की 6000 भाषाओं में मात्र 300 ही सुरक्षित रह जाएगी। एक तरफ तो भाषा विविधता के समर्थक हैं जो इस प्रकार भाषाओं के विलुप्ति से होने वाले सांस्कृतिक-सामाजिक हानि पर विचार किए जाने का आग्रह कर रहे हैं। दूसरी तरफ भाषायी वैश्वीकरण के समर्थक दुनियां में एक या कुछ भाषाओं के प्रसार पर ज़ोर देते हैं। जिन देशों या समुदायों ने एक ही भाषा की परिधि में रहना सीख लिया और जिन्हें उस से लाभ हैं उनके लिए तो भाषाओं के विलुप्ति का कोई अर्थ ही नहीं है बल्कि वह निकट भविष्य में उनके लिए अधिक अच्छा है। जैसे इस देश में ऐतिहासिक काल से होता आ रहा है। औपनिवेशिक काल से पहले संस्कृत भाषा और आज अंग्रेज़ी बोलने वाले देश को चर रहे हैं।

साधारणत: हर अध्ययन और सर्वेक्षण का उदेश्य विषय का अधिक से अधिक सरलीकरण होता है परंतु होता इससे उलट ही है। सरलीकरण के नाम पर अधिक से अधिक मूल चीजों को हटाना। लाहौल-स्पिति की भाषाओं का नामकरण में भी ऐसा ही कुछ हुआ लगता है। भविष्य में इन भाषाओं ने भी विलुप्त हो ही जाना है। इसलिए आवश्यकता है इनके एकत्रीकरण या संग्रहण की ताकि आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि इस क्षेत्र में ये भाषाएं बोली जाती थीं।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *