चुनाव परिणामों के घोषित होने के एक सप्ताह बाद हिमाचल प्रदेश में भाजपा ने राज्य के मुख्यमंत्री का नाम घोषित कर ही दिया। आखिर हिमाचल प्रदेश को विधायकों में ही मुख्यमंत्री मिल गया। अनुमान लगाए जा रहे थे कि मुख्यमंत्री पेराशूट से उतारे जायेंगे परंतु ऐसा नहीं हो सका। वैसे तो राज्य की जनता ने खुले मन से भाजपा को वोट देकर विजयी बनाया था। लेकिन 48% वोट लेकर 44 सीटों के साथ दो तिहाई बहुमत प्राप्त होने के बावजूद हिमाचल प्रदेश में इतने दिन लग गए, पार्टी को मुख्यमंत्री तय करने के लिए। वह भी केंद्रीय मंत्रियों और पर्यवेक्षकों के राज्य में दो बार आने तथा विचार विमर्श के बाद। इससे पार्टी की बेचारगी का अनुमान लगाना कठिन नहीं, भले ही दावे जो भी किए जाते हों। जबकि अन्य राज्यों में पार्टी ने यह काम बिना देरी और खींचतान के कर दिया था। इस से यह तो साफ ही है कि प्रदेश में पार्टी के अंदर और बाहर वह हरा-2 नहीं है जो दिखाने का प्रयास किया जाता है। अभी वे दिन बीते अधिक समय नहीं हुआ है जब पार्टी ने कई राज्यों में अनापेक्षित लोगों को मुख्यमंत्री बनाया था, वह भी बहुत शांति से। हिमाचल प्रदेश के हालातों से यह समझा जा सकता है कि काठ की हांडी अधिक समय तक आग पर नहीं रखी जा सकती।

प्रदेश भाजपा में साफ तौर पर दो गुट काम कर रहे थे। एक का नेतृत्व केंद्रीय स्वास्थय एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा और दूसरे गुट का दो बार मुख्यमंत्री रह चुके प्रेम कुमार धूमल जी। जहां नड्डा जी अभी आयु के लिहाज से छोटे थे और पार्टी को 15-20 वर्ष की सेवा दे सकते थे। वहीं पर धूमल साहब अपने पुत्र अनुराग ठाकुर को राजनैतिक स्थायित्व देकर अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। भले ही भाजपा या उसके नेता प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह विकास के नाम की राजनीति की माला जितनी भी जपते रहें  लेकिन सच्चाई यह है कि करते सिर्फ जातिवादी और धर्म आधारित राजनीति ही हैं। हिमाचल प्रदेश में सबसे अधिक आबादी क्रमश: राजपूतों, दलितों तथा ब्राह्मणों की है। दलितों की जनसंख्या काफी होने के बावजूद आज भी वे अपने आप को एक जुट नहीं कर पाये हैं और अधिक संख्या में कांग्रेस के पीछे तो अब काफी लोग भाजपा के साथ हो रहे हैं। संगठित नहीं होने के कारण वे इन दोनों पार्टियों के नेताओं के पीछे झोले उठाकर चलने के लिए मजबूर रहते हैं और जो कुछ उनके सामने फेंका जाता है उसी से संतोष करना पड़ता है।

अब रह जाते हैं राजपूत और ब्राह्मण, जो राज्य में पहले और तीसरे स्थान पर हैं। आज तक के प्रजातांत्रिक इतिहास में राज्य के मुख्य के रूप में सिर्फ एक बार शांता कुमार ब्राह्मण मुख्यमंत्री बन सके हैं। अन्यथा आज तक डॉ. यशवंत सिंह परमार, राम लाल, वीरभद्र सिंह और प्रेम कुमार धूमल सबके सब राजपूतों में से रहे हैं। आज भी प्रेम कुमार धूमल राजपूत तथा जेपी नड्डा ब्राह्मण जातियों से हैं। इसलिए शाह तथा मोदी को निर्णय लेने में समय लगा। यद्यपि चुनावों से पहले भी दोनों गुटों का पार्टी के आला कमान पर मुख्यमंत्री के उम्मीदवार को घोषित करने का बहुत बड़ा दबाब था। इसी लिए पार्टी को बहुत बाद में चुनाव प्रचार के दौरान धूमल साहब के नाम की घोषणा करनी पड़ी। इस मामले में यह भी बताया जा रहा है कि गुटों के बीच यह तय हुआ था कि 2019 के लोकसभा चुनावों तक धूमल साहब मुख्यमंत्री रहेंगे उसके बाद नड्डा जी को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। परन्तु दुर्भाग्य से धूमल साहब चुनाव हार गए और दवा कर रखा गया प्रेत एक बार फिर उठ खड़ा हो गया, जिसे काबू करने में इतने दिन लग गए। अब एक बार फिर पार्टी को राज्य की कमान एक ठाकुर के हवाले करनी पड़ी है। प्रदेश की राजनीति में जाति के अतिरिक्त क्षेत्र का भी खासा दबाव है। अब क्योंकि 1966 में राज्यों का पुनर्गठन हुआ था और पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों को मिला कर आज के हिमाचल प्रदेश को नई शक्ल दी गई थी। इसलिए आज भी पुराना और नया हिमाचल की बात होती है। हिमाचल में मिलाये गए क्षेत्र जिसमें ज़िला कांगड़ा जिसमें वर्तमान का ज़िला कुल्लू, लाहौल-स्पिति भी शामिल थे। इसके अलावा ऊपरी और निचला हिमाचल के रूप में एक अन्य विचार भी काम करता है। जिनमें शिमला तथा अन्य ऊपरी क्षेत्र तथा निचले क्षेत्रों में कांगड़ा आदि को शामिल किया जाता है। धर्मशाला में विधानसभा का शीतकालीन कार्यालय और सत्र चलाया जाना जिसका उदाहरण है। आज तक प्रदेश के अधिक समय मुख्यमंत्री ऊपर के क्षेत्रों से रहे हैं, भले ही विधायकों कि अधिक संख्या निचले क्षेत्रों से है।

नये मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ज़िला मंडी के सिराज विधानसभा सीट से कई बार जीत चुके हैं और पिछली भाजपा सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। ज़िला मंडी जनसंख्या के लिहाज में प्रदेश का दूसरा बड़ा ज़िला है। इस ज़िले से 10 विधायक चुन कर जाते हैं। इस चुनाव में तो पहली बार दस में से नौ विधायक भाजपा के चुन कर गए हैं। जय राम ठाकुर के प्रदेश के 13वें मुख्यमंत्री चुने जाने से खास बात यह हुई है कि इस बड़े जिले को पहली बार उसका यथोचित अधिकार प्राप्त हुआ है। दूसरा प्रदेश के बहुसंख्यक राजपूत जाति का फिर राजनैतिक दबदबा बना रहेगा। तीसरी बात जय राम ठाकुर न तो कभी किसी तरह के विवाद में रहे और न ही बहुत अधिक महत्वाकांक्षी ही रहे हैं। इस लिए आशा की जानी चाहिए कि वह दोनों गुटों को ठीक से संभाल पाएंगे। जिला मंडी से मुख्यमंत्री बनाए जाने से प्रदेश की राजनीति पर एक दूरगामी प्रभाव पड़ने की पूरी संभावना है। मण्डी जिला जो कि मण्डी संसदीय चुनाव क्षेत्र का जनसंख्या के अनुसार सबसे बड़ा हिस्सा है इसलिए लोकसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाता है। लोकसभा क्षेत्र की 10 सीटें इसी जिले से आती हैं शेष सात विधान सभा क्षेत्रों में जिला कुल्लू की चार तथा भरमौर, लाहौल-स्पीति व किन्नौर की (एक-2) तीन अनुसूचित जनजातीय सीटें आती हैं। जिनमें अनुसूचित जनजातीय सीटों में मतदाताओं की संख्या कम है तो कुल्लू का मतदाता व्यवहार सदा मिला जुला सा रहता है। मण्डी की इस लोकसभा सीट की विशेषता यह रही है उस पर अधिक समय तक वीरभद्र सिंह या उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह के द्वारा उनके परिवार का वर्चस्व रहा है। मण्डी जिले के इस राजनैतिक परिवर्तन से वीरभद्र सिंह परिवार के राजनैतिक हितों पर अवश्य ही विपरीत प्रभाव पड़ेंगे।

यहां धूमल साहब के चुनाव हारने और बाद में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पिछड़ने के कारणों में एक कारण उनके भूतकाल की राजनैतिक कृत्यों से सीधा सम्बन्ध रखता है। और वह है ‘शांता कुमार फेक्टर’। 1990-92 के दौरान के मुख्यमंत्रित्व काल में सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल पर ‘काम नहीं, वेतन नहीं’ के निर्णय लेने कारण, शांता कुमार को सरकारी कर्मचारियों, जो प्रदेश में एक बड़ी राजनैतिक शक्ति हैं, का कोपभाजन का सामना करना पड़ा था। 1998 में जब राज्य में भाजपा की सरकार बनी तो शांता कुमार को पार्टी ने दरकिनार कर धूमल को मुख्यमंत्री बना दिया। तब इस कार्य में वर्तमान के प्रधान मंत्री मोदी ने धूमल की सहायता की थी। जोकि शांता कुमार को राज्य की राजनीति से बाहर करने की एक सफल चाल थी। जिसे वह शायद आज तक भी भुला नहीं पाये। संभवत: उस हिसाब को चुकता करने के इरादे से ही शांता कुमार ने सबसे पहले एक ब्यान जारी करके कहा था कि पार्टी के बहुत से चुने हुए नेता हैं जो मुख्यमंत्री बन सकते हैं इसलिए विधायकों से बाहर का मुख्यमंत्री बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। धूमल के पिछड़ने का एक अन्य कारण उनका परिवार मोह, धूमल बेटे अनुराग को राज्य की राजनीति में स्थापित करना चाहते थे जो कि भाजपा के परिवार के विरुद्ध स्थापित राजनैतिक विचार के खिलाफ जाता था।

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