हिमाचल प्रदेश और गुजरात, हर तरह से एक दूसरे से भिन्न दो राज्य। भौगोलिक स्थिति, स्थालाकृतीय दशाएएं, जलवायु, आर्थिकी, सांस्कृतिक एवं हर प्रकार से भिन्न। देश के दो भिन्न संदर्श प्रतिदर्श राज्य, इस देश की खूबसूरती के नमूने। जहां हिमाचल प्रदेश पहाड़ों की रानी, प्राकृतिक सुंदरता का उदाहरण है, वहीं गुजरात समुद्र के किनारे का एक नायब राज्य। इस सबसे हट कर राजनैतिक तौर पर भी यह दो राज्य अलग संदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जहां देश के लगभग हर छोटे-बड़े राज्य में क्षेत्रीय राजनीति या क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टियों का ज़ोर चल रहा है, वहीं पर हिमाचल प्रदेश और गुजरात में अभी क्षेत्रियता का प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी क्षेत्रीय राजनैतिक शक्ति का अस्तित्व नहीं बन पाया है। इन दोनों राज्यों में राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों का ही वर्चस्व है, कांग्रेस और भाजपा। यह ठीक है कि गुजरात में जहां एक लंबे समय से भाजपा ही सत्ता पर काबिज रही, वहीं पर हिमाचल प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस को वैकल्पिक रूप में सत्ता में बिठाया जाता रहा है। राजनैतिक विकल्पहीनता दोनों राज्यों में विद्यमान है।

इस बार भी चुनाव आयोग के मानकों के अनुसार दोनों राज्यों के चुनाव एक साथ होने थे। लेकिन चुनाव आयोग ने न जाने क्यों दोनों राज्यों के चुनावों के बीच एक महीने का अन्तर डाल दिया? यद्यपि आयोग का कहना है कि गुजरात में बाढ़ राहत कार्यों के चलते ऐसा किया गया, परंतु यह तर्क सबके गले नहीं उतर रहा है। इन दोनों राज्यों में से हिमाचल प्रदेश में.75 % से अधिक मतदान के साथ ही चुनाव 9 नवंबर को समाप्त हो गए (मतदाताओं की भूमिका) लेकिन चुनाव आयोग की भूमिका अभी शेष है। जबकि गुजरात में यह अभी दिसंबर 18 तक चलेगा। इधर हिमाचल प्रदेश के 68 विधान सभा सीटों, 50 लाख मतदाताओं, 337 प्रत्याशियों तथा 70 लाख हिमाचल वासियों का भाग्य 18 दिसंबर तक इवीएम में बंद हो जायेगा, जिसका चुनाव आयोग के विवेकाधिकार के अतिरिक्त कोई युक्तियुक्त कारण नहीं है।

इन दो राज्यों के चुनावों का देश के राजनैतिक भविष्य के संदर्भ में अत्यधिक महत्व है। क्योंकि भाजपा जो 2014 में केन्द्र में सत्ता में आई तब से लगातार प्रगति पर है, सिर्फ बिहार और पंजाब को छोड़ अन्य चुनावों में जीती ही है। यद्यपि नितीश कुमार के अभूतपूर्व राजनैतिक अवसरवादिता के चलते बिहार भी भाजपा के पास जा चुका है। इसलिए भाजपा के लिए यह चुनाव महत्वपूर्ण है, इन चुनावों में जीत का अर्थ होगा उसके जीत के रथ को रोका नहीं जा सका इससे 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए उसका मनोबल बढ़ेगा। दूसरी तरफ विपक्ष विशेषकर कांग्रेस के लिए यह अस्तित्व का प्रश्न होगा। शेष विपक्ष की पार्टियां तो अस्त पस्त हो ही चुकी हैं। अधिकतर पार्टियों ने अपना राष्ट्रीय पार्टी होने का दावा भी खो दिया है। क्षेत्रीय पार्टियां आज लगभग पंगू बन चुकी हें।

देश के अन्य कई राज्यों की तरह जहां गुजरात का धार्मिक और जातीय आधार पर काफी हद तक राजनैतिक ध्रुवीकरण किया गया है। वही पर हिमाचल प्रदेश की राजनीति अभी तक इस तरह ध्रुविकृत नहीं हुई है। हिमाचल प्रदेश की  राजनीति धर्म व जाति से उतना प्रभावित नहीं है जितना कि गुजरात की राजनीति है।

इन दो राज्यों के चुनावी मुद्दों में कुछ अन्तर तो अवश्य है। जहां हिमाचल प्रदेश के चुनावों में राष्ट्रीय एवं आर्थिक मुद्दे जैसे ‘नोटबंदी’ तथा ‘जीएसटी’ आदि को कोई विशेष स्थान नहीं मिल पाया। वहीं पर गुजरात में इन दो मुद्दों को मुख्य रूप से उठाया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश में तो शायद राज्य स्तरीय मुद्दा भी कोई नहीं था। हां! भाजपा ने कभी-2 गुड़िया कांड को हवा जरूर दी। उसके अतिरिक्त एक दूसरी पार्टी के नेताओं पर व्यक्तिगत आक्षेप और आरोप प्रत्यारोप पर ही ज़ोर रहा। ऐसा दिखता रहा जैसे लड़ाई पार्टियों की नहीं व्यक्तियों की हो रही हो, वीरभद्र बनाम धूमल। पार्टियों के स्टार प्रचारक भी आकर कोई बड़ी बात नहीं कर पाये। यहां तक कि देश के प्रधानमंत्री भी जुमले बाजी में व्यस्त रहे। उदाहरण है भाजपा जीतेगी तो विकास की गाड़ी दो इंजन की हो जाएगी। जबकि हिमाचल प्रदेश में तो विकास के एक भिन्न मॉडल की बात होनी चाहिए थी। विकास का ऐसा मॉडल जो पहाड़ी राज्यों के लिए उपयुक्त हो। हां! मतदाताओं के अपने-2 मुद्दे रहे, किसी को पानी, किसी को सड़क आदि-2।

हिमाचल प्रदेश के विपरीत गुजरात में सरकारी सेवाओं में आरक्षण एक भारी मुद्दा बना है। राज्य में आरक्षण को लेकर तीन युवा नेताओं को अच्छा जन समर्थन मिला है और कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियां उन युवा नेताओं को अपने तरफ खींचने का प्रयास ज़ोर शोर से कर रही हें। उन युवा नेताओं  हार्दिक, अलपेश और जिग्नेश, जोकि अलग-2 वर्गों और जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके हित न सिर्फ अलग-2 है अपितु विरोधाभासी भी हैं, एक-दूसरे के हितों को काटते हैं। जहां हार्दिक गुजरात के पटेलों (पाटीदारों) जो कि आर्थिक तौर पर सक्षम एवं सशक्त हैं को सरकारी सेवाओं में आरक्षण की मांग करते हैं। अलपेश जो कि अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं वह चाहते हैं कि उनके लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण का दायरा घटे न, जो कि पाटीदारों को आरक्षण देने से संभव है। तीसरी तरफ जिग्नेश है जो दलितों (अनुसूचित जातियों) के प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं, यद्यपि वह भी दलितों में एक जाति विशेष का प्रतिनिधित्व करते हैं, की मांग है कि दलितों को उनके अधिकार मिलते रहें। इन तीनों नेताओं को अलग-2 वर्गों और जातियों के आंदोलनों से पहचान मिली है। देश की दो राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भाजपा उन्हें अपनी-2 तरफ करने का प्रयास कर रही हैं। ये तीनों एक ही पार्टी में चले भी गए तो उनके हितों का सामंजस्य बिठाना भी बहुत कठिन प्रतीत होता है।

हिमाचल प्रदेश के मतदाताओं का मत पेटियों में बंद हो चुका है और अब प्रतीक्षा है 18 दिसंबर की जब उनको उनके मत के परिणाम का पता चलेगा और उसके भाग्य का खुलासा होगा। हिमाचल प्रदेश में तो राजाओं, रानियों, उनके उताराधिकारियों, ऊंचे खानदानों, नेता-नेत्री, पुत्रों व पुत्रियों पर अधिक विश्वास जताया गया है। दोनों पार्टियों ने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि पार्टी टिकट उपरोक्त वर्ग के प्रत्याशियों को दिये जायें। यहां तक कि इस वर्ग के प्रत्याशियों के लिए टिकट के लिए पार्टी के निर्धारित मानकों और नियमों को भी ताक पर रख दिया गया। एक पार्टी के नाराज़ दूसरी पार्टी के उम्मीदवार बन गए। यहां तक कि तत्कालीन सरकार के एक मंत्री को दूसरी पार्टी ने टिकट भी दे दिया। अब प्रतीक्षा कीजिये गुजरात के साथ-2 चुनाव परिणाम की भले ही हिमाचल प्रदेश यह तीन माह की प्रक्रिया क्यों न …..?

दोनों पार्टियों ने मतदान के कुछ दिन पहले अपने-2 घोषणा पत्र भी जारी किए। जिसमें वही लोक लुभावने वादे। मतदाताओं को ठगने के वायदे। भाजपा ने चुनाव घोषणा पत्र का नाम बदलकर ‘स्वर्णिम हिमाचल दृष्टि-2017’ अवश्य रखा है। जहां भाजपा विद्यार्थियों को मुफ्त लेपटॉप और डाटा देगी वहीं कांग्रेस कर्मचारियों पर मेहरबान होने का वादा कर रही है। एक पार्टी कहती है ग्रेड तीन और चार की नौकरियों के लिए साक्षात्कार समाप्त किए जाएंगे। चलिये हिमाचल वालो करिए प्रतीक्षा 38 दिन की, 18 दिसंबर तक।

ल.च.ढिस्सा

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