गंगा, यमुना और चनाब आदि नदियां सुख जाएंगी, यदि कोई ऐसा कहे तो सब उसे पागल कहेंगे। लेकिन यह सच हो सकता है क्योंकि हिमालय के वे समस्त ग्लेशियर सिकुड़ते जा रहे हैं, जहां से ये नदियां निकलती हैं। यद्यपि यह समस्या पूरे विश्व में पैदा हो रही है, परंतु हिमालय क्षेत्र में इसकी प्रक्रिया कुछ अधिक तीव्र लग रही है। कुछ महत्वपूर्ण वैज्ञानिकों द्वारा यह प्रस्थापना दी भी गई है कि धरती गरम हो रही है। लेकिन पक्के प्रमाणों के अभाव और निहित स्वार्थ, जो इस पर पर्दा डालते रहे, के कारण इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया और कोई विशेष सार्थक प्रयास नहीं किए गए। लेकिन अभी कुछ समय से विश्व के बहुत से वैज्ञानिकों के अध्ययनों और जलवायु में तेज़ी से बदलाव के कारण इस तरफ लोगों का ध्यान गया है और चिंता भी बढ़ी है।

भूतकाल में किए गए अध्ययनों के आधार पर यह पूर्वामान कि आर्कटिक क्षेत्र भी गर्मियों में अपनी सारी वर्फ खो देगा, सही ही है। एक अध्ययन के अनुसार आज आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ की मोटाई में 42 प्रतिशत की कमी आई है और बर्फ़ीला क्षेत्र भी सिकुड़ता जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार अंटार्कटिक प्रायद्वीप के दोनों तरफ स्थित बर्फीले क्षेत्र में 1950-1997 तक 7000 वर्ग कि.मी. की कमी आई है और सिर्फ 1998 में ही यह कमी 3000 वर्ग कि.मी. दर्ज़ की गई है। इसी प्रकार विश्व की तमाम पर्वत-श्रेणियों रॉकीज़, एंडीज़, ऐलप्स और हिमालय में बर्फ घट रही है। हिमालय पर्वत श्रेणी में यह प्रक्रिया अधिक तेज़ी से चल रही है। भारत में ‘डोकरियानी वामक’ ग्लेशियर 1992-97 के बीच 16 मीटर पीछे खिसक गया तो सिर्फ 1998 में ही 20 मीटर का क्षेत्र छोड़ गया। विश्व प्रसिद्ध ‘पिंडारी’ ग्लेशियर भी अपनी वास्तविक स्थिति से एक किलोमीटर पीछे खिसक चुका है। चार से सात हज़ार मीटर की ऊंचाई में स्थित ‘गंगोत्री’ ग्लेशियर 32 कि.मी. लंबा और 2.5 कि.मी. चौड़ा था। अब सिर्फ बर्फ का एक बड़ा-सा ढेर मात्र बचा हुआ है। हाल में छपे एक समाचार के अनुसार गंगा के उद्गम स्थल गोमुख की आकृति बदल रही है जिसका कारण तापमान में वृद्धि और ग्लेशियर का अधिक पिघलना है। वाडिया भू-विज्ञान संस्थान गंगोत्री ग्लेशियर पर 2014 से अध्ययन कर रहा है। संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार 2014 से गंगोत्री ग्लेशियर 22 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पीछे खिसक रहा है।

हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर कुछ समय पहले तक 30 लाख हैक्टेयर यानि पूरे हिमालय के 17 प्रतिशत क्षेत्र में फैले हुए थे। लेकिन अब यह क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है और एक अनुमान के अनुसार आने वाले दो दशकों में अधिकतर ग्लेशियर या तो पूरी तरह समाप्त हो जायेंगे या फिर नाम-मात्र रह जायेंगे। एक गणना के अनुसार पूरे हिमालय क्षेत्र में लगभग 15 हज़ार ग्लेशियर हैं और उनमें ही पूरे देश को हरा-भरा रखने में मदद करने वाली समस्त नदियों का उद्गम है। इस प्रकार ग्लेशियरों के खत्म होने और बर्फ के न रहने पर तमाम नदियां सूख जायेंगी और इस क्षेत्र में बसे करोड़ों लोगों, पालतू जानवरों तथा हजारों प्रकार के जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा।

इस संबंध में ‘सद्प्रयास’ ने अपने सीमित साधनो के रहते लाहौल तथा पांगी क्षेत्र के कुछ ग्लेशियरों का अध्ययन किया था, जिसके परिणाम भी चौंका देने वाले हैं। इसमें कुछ क्षेत्र हिमाचल प्रदेश के ‘ठंडा मरुस्थल क्षेत्र’ में पड़ता है, जिसमें पीर पंजाल, महान हिमालय और जंसकर पर्वत-श्रेणियां शामिल हैं। यह क्षेत्र औसतन 5500 मीटर की ऊंचाई का है। ‘ठंडा मरुस्थल क्षेत्र’ में ज़िला लाहौल-स्पिती के स्पिती उपमंडल व लाहौल का एक बड़ा हिस्सा तथा किन्नौर का पूह उपमंडल आता है। यह ‘ठंडा मरुस्थल क्षेत्र’ हिमाचल प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग एक तिहाई भू-भाग में फैला हुआ है।

स्रोगलिङ ज़रिमा शूकी जी ओ………….।

यह लाहौल में गाए जाने वाले लोक गीत की एक पंक्ति है। इस गीत में विवरण है कि किस प्रकार ‘स्रोगलिङ ज़रिम’ यानि स्रोगलिङ नाम का ग्लेशियर सूख गया और सैकड़ों लोग प्रभावित हुए। गीत के बोल बहुत ही करुणादायक हैं। इस लोक गीत में बताया गया है कि जाहलमां नाले में चार ग्लेशियरों का पानी आता था, ‘थोंच, लंपड़, मलोठी और स्रोगलिङ।’ लगभग आठ दशक पहले इसमें से स्रोगलिङ ग्लेशियर का अस्तित्व समाप्त हो गया। इस ग्लेशियर के खत्म हो जाने से तीन गांव ‘चमर’, ‘रहङफुन्ज़ा’ तथा ‘रोसदङ’ जो वर्तमान गोहरमा गांव से लगभग 1.5 कि.मी. ऊपर जहां आज वन विभाग की नर्सरी है, बसे थे, वे उजड़ गए और नीचे वर्तमान के गोहरमा गांव को बसाया है। आज के गोहरमा गांव में भी पीने के पानी की कमी पड़ चुकी है और बताया गया है कि अब गांव वालों ने पीने के पानी की राशनिंग करने का निर्णय लिया है। आज जाहलमां नाले को तीन ग्लेशियरों थोंच, लंपड़ तथा मलोठी से पानी मिलता है। इनमें बीच का ग्लेशियर लंपड़ एक-दो वर्षों में खत्म हो सकता है। शेष बचे दो थोंच और मलोठी ग्लेशियरों की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। यह नाला यदि सूख जाता है तो नाले पर पूरी तरह निर्भर गांव ओथङ, यंगथङ, तिबोग, लोमच, जुण्डा, तलजोन, जाहलमां, हालिंग, फूड़ा, गोहरमा, शामङ, रपडिंङ, कोठी, लिंडूर, मालहङ आदि तथा इन गांवों के हजारों लोगों, जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो जाएगा। यहां एक और बात लिखना अनुचित न होगा कि सरकार या व्यवस्था की ‘विकास की रुग्ण सोच’ के चलते लंबे समय से कई नहरें निकाली गई और पुरानी नहरों को त्यागा जाता रहा, जब कि सबको दिखाता है कि नाले में जलस्तर घटता जा रहा है।

ध्यान दें, पूरे जनजातीय क्षेत्र लाहौल तथा पांगी के सीधे-सादे और प्रकृति के अति निकट रहने वाले लोगों ने ‘ग्लेशियर’ को नाम दे रखा है ‘ज़रिम’। यानि ‘तेर’ या कभी खत्म होने वाला खजाना। इसके अतिरिक्त भी इन लोगों में पानी और बर्फ पूजन की प्रथा धार्मिक गतिविधि की तरह आज भी प्रचलित है। सर्दियों में त्यौहारों के समय लोगों, विशेषकर महिलाओं में प्रतियोगिता (अनौपचारिक) होती है कि सबसे बड़े त्यौहार ‘कुंह’, ‘कुहन्स’, ‘जोकारु’ या फागड़ी के सुबह-सुबह सबसे पहले पानी के स्त्रोत पर कौन पहुंचता है। इसके अलावा भी नए वर्ष के संक्रांति (पहला दिन) के दिन लोग सबसे पहले जल का दर्शन करना शुभ समझते हैं।

इस सिलसिले में सबसे महत्वपूर्ण जानकारी जोबरंग गांव के श्री बलदेव जी ने अपने 95 वर्षीय पिता श्री शिवदास के हवाले से दी कि ‘नेणी ज़रिम’ (ग्लेशियर) जो राशेल, जोबरंग तथा रपे गांव के सैंकड़ों बीघा जमीन की सिंचाई करवाता है, वह गत एक सौ सालों में लगभग 1 कि.मी. कम हो गया है। इसमें भी महत्वपूर्ण यह कि पहले के 80-90 वर्षों में जो कमी आई है उससे कहीं अधिक कमी हल के 8-10 वर्षों में आई है। उसी क्षेत्र में रशेल गांव के ठीक ऊपर ‘सेली नाला’ आता है, जिसके उद्गम में बर्फ आज लगभग समाप्त हो चुकी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि 1985-86 तक उस नाले में सितंबर-अक्तूबर तक गांव के निकट तक बर्फ जमी रहती थी और लोग वहां से शराब निकालने के लिए प्रयोग होने वाली बर्फ लाया करते थे। यही स्थिति पूरे हिमालय क्षेत्र की हो रही है। भारतीय भू-विज्ञान सर्वेक्षण संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों के अनुसार गंगोत्री ग्लेशियर 1935 और 1956 के बीच लगभग 10 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पीछे खिसका, लेकिन 1956 और 1995 के बीच यह गति 27-30 मीटर तक पहुंच गई, जबकि 1996-1999 के बीच गंगोत्री 76 मीटर तक पीछे खिसक गया। इसी तरह हिमाचल स्थित त्रिलोकीनाथ ग्लेशियर 1969—1995 के बीच 15 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पीछे खिसका है। यहां का ‘बड़ा शिगरी ग्लेशियर’ भी 1977-193 के बीच 36 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पीछे खिसक गया है। इसी तरह सिक्किम का सबसे बड़ा ग्लेशियर ‘जेमू’ 1977-84 के बीच 28 मीटर सालाना की दर से गायब हुआ है।

शंशा गांव के नाले का पानी आज अक्तूबर के अन्त में भी दोपहर बाद मिट्टी वाला हो रहा है, जकी पूरी घाटी में चंद्रभागा नदी सहित समस्त नालों में पानी बिलकुल साफ आ रहा है। पूछने पर स्थानीय लोगों ने बताया कि इस नाले में यह बदलाव गत 8-10 वर्षों से आया है। इसका बड़ा कारण भी ग्लेशियर का तेजी से पिघलना है। इस नाले का उद्गम-स्थल ‘गुमस बेही ज़रिम’ के बारे में यह बताया गया कि गत 40 वर्षों में इस ग्लेशियर की बर्फ भी किलोमीटरों में पिघल चुकी है और आज से 30-40 वर्ष पहले ‘पहवाल’ (चरवाहे) जहां बर्फ पर चलते हुए गुजरते थे, आज वहां दूर-2 तक धूल और पत्थर हैं।

लाहौल का ही एक और गांव, लोट के नाले (लोट नाला) का उद्गम ग्लेशियर, जो कि किरतिंग गांव से साफ दिखता है, के बारे में बताया गया कि गत 10-15 वर्षों में यह 60-70 प्रतिशत खत्म हो चुका है। इस ग्लेशियर की 30-40 वर्ष पहले की जो स्थिति बताई जाती है, आज उसका मात्र 10-15 प्रतिशत ही शेष रह गया है।

गांव मिंदल, उपमंडल पांगी, ज़िला चंबा में पड़ता है और पीर पंजाल पर्वत श्रेणी में आता है। यह गांव साच गांव के ठीक सामने चिनाब के दूसरी तरफ पहाड़ी पर स्थित है। इस गांव को पानी की आपूर्ति एकमात्र ‘अजल’ नाला ही करता है और इस नाले का पानी का स्रोत ‘अजल ज़रिम’ है। आज ऊपर से नीचे तक लगभग दो किलोमीटर का नाला बिलकुल सूख चुका है। 1991 में मैंने पहली बार उस नाले को पार किया था। जून माह के दूसरे सप्ताह के अंतिम दिन थे। पूरा अजल नाला बर्फ से भरा हुआ था और  ग्लेशियर लगभग दरिया-ए-चिनाब तक अविकल बना हुआ था। लेकिन आज देखता हूं तो नाला बर्फ व पानी के बिना सूखा पड़ा है और गांव की पानी की आपूर्ति के लिए गांव के ऊपर पहाड़ के दूसरी ओर से लगभग तीन किलोमीटर पाइप बिछा कर पानी लाया गया था। इसके अतिरिक्त भी पांगी में ही साच, कुठल आदि कई गांव हैं, जहां सिंचाई का पानी तो बिलकुल ही खत्म हो चुका है, लोगों के पीने के पानी की भी समस्या पैदा हुई है। यह भी बताया गया कि साच गांव में दस-पंद्रह वर्ष पहले तक चश्मे के पानी को एक दस इंच के पाइप द्वारा लाया जाता था और खेतों की सिंचाई होती थी। परन्तु आज उसका नमो निशान नहीं मिलता। क्योंकि पानी का स्रोत ही सूख चुका है, इस वजह से फसलों का उत्पादन भी बहुत घट गया है। पांगी में ही ‘कुड़िऊं’ चोटी पर ‘शूरियां-गूरियां ज़रिम’ (ग्लेशियर) है जो साच नाले के पानी का स्रोत है, भी पिछले 20 वर्षों में 40-50 मीटर खत्म हो चुका है।

ये हैं आने वाले समय की भयावह स्थिति की तरफ संकेत करने वाले तथ्य। हमें लगता है कि तमाम हिमालय क्षेत्र, विशेषकर वहां जहां सिंचित खेती होती है, में यह विषय सही अर्थों में चिंता का कारण होना चाहिए। इसके अतिरिक्त भी मैदानी क्षेत्रों में तो पानी जमीन के नीचे 100 नहीं तो 1000 मीटर पर ही मिल सकता है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में यदि नाले सूख गए तो उन क्षेत्रों की तबाही के अतिरिक्त कुछ नहीं सूझता।

अपने अध्ययनों के दौरान कुछ अनुभवी लोगों से बातचीत करने तथा दूसरे स्त्रोतों का भी अध्ययन करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि ग्लेशियरों के खत्म होने या घटने के बहुत से कारण हैं जिनमें कुछ मुख्य और महत्वपूर्ण कारण निम्न हैं:
1.      वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड की वृद्धि— स्वीडिश वैज्ञानिक सावंते अरहीनियस ने पिछली सदी के प्रारम्भ में ही यह चेतावनी दी थी कि जलाया जा रहा खनिज ईंधन वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड के स्तर को बढ़ाकर ग्रीन हाऊस प्रभाव को जन्म दे सकता है। वातावरण में इस गैस की मात्रा औद्योगिक क्रांति से पूर्व प्रति दस लाख 280 दर्ज़ की गई थी। 1960 के आते-आते यह बढ़कर 317 और 1999 में यह 368 प्रति दस लाख हो चुकी थी यानि मात्र चार दशकों के अंदर 16 प्रतिशत की वृद्धि।
2.      तापमान में वृद्धि— इसे ‘ग्लोबल वार्मिंग’ भी कहते हैं। जैसे-जैसे कार्बन डाईऑक्साइड की सांद्रता बढ़ी है, वैसे-वैसे पृथ्वी के तापमान में भी वृद्धि हुई है। 1975 से 1999 के बीच औसत तापक्रम 13.94० सेल्सियस से बढ़कर 14.35० सेल्सियस हो गया। औसत तापक्रम को वर्षों के आधार पर दर्ज़ किए जाने की प्रक्रिया जब से शुरू हुई है यानि 1866 से अब तक के 23 सबसे अधिक ऊंचे तापक्रम वाले वर्ष 1966 से आज तक के वर्षों में आते हैं। तापमान में वृद्धि और उसका ग्लेशियर पर पड़ने वाले कुप्रभाव को एक अध्ययन-सिद्ध उदाहरण देकर स्पष्ट किया जा सकता है। लाहौल में ‘शंशा नाले’ का पानी जो अक्तूबर के अंत में भी ‘मटियाला’ आ रहा है, जो कुछ वर्ष पहले असंभव माना जा सकता था। इस नाले के पानी का मिट्टी वाला आने का एक मुख्य कारण है कि ‘गुमासबेही ज़रिम’ जो इसका उद्गम है, का एक हिस्सा ‘खोलम्बर’ सितंबर-अक्तूबर के महीने में सूर्य की किरणों के सीधे सामने रहता है। क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में तापमान में वृद्धि हुई है, कारणवश ग्लेशियर अधिक पिघलता रहा है और नाले का पानी असमय मिट्टी वाला बह रहा है।
3.      वनों का अत्यधिक कटान— ग्लेशियरों के अधिक तेजी से खत्म होने या कम होने के कारण में पिछले 50-100 वर्षों के दौरान वनों के अत्यधिक कटान भी हैं। जनसंख्या वृद्धि तथा अन्य कारणों से ईंधन, इमारती लकड़ी तथा चारे की अधिक मांग के कारण वनों का दोहन अधिक किया गया जिससे वातावरण में तापमान का असंतुलन पैदा हो गया और जिसका सीधा असर ग्लेशियरों के तेजी से खत्म होने के रूप में सामने आया है। वनों के अधिक कटने का उदाहरण गांव जाहलमां लाहौल-स्पीति का दिया जा सकता है। यहां साफ पता चलता है कि गांव के ऊपर पहाड़ी पर 50-60 वर्ष पहले तक ‘शूर’ का घना जंगल था, जो आज साफ है।
4.      पानी का अत्यधिक दोहन— जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ खाने-पीने तथा चारे की अधिक मांग के दबाव में अधिक भूमि पर खेती की जाने लगी और सरकार की अविवेकपूर्ण विकास की नीतियों के चलते भी नालों से अधिक से अधिक नहरें तथा कुहलें निकाल कर अधिक से अधिक पानी को खींचा गया, जिससे ग्लेशियरों पर अधिक दबाव पड़ा है।
5.      बर्फ का कम पड़ना— गत कुछ वर्षों से बर्फ भी कम पद रही है, क्योंकि ग्लेशियरों के ऊपर नई बर्फ नहीं पड़ रही है। इसलिए पुराने ग्लेशियर अधिक पिघलते जा रहे हैं। लाहौल और पांगी में भूतकाल में जहां प्रतिवर्ष कई-कई मीटर बर्फ गिरती थी वहां गत पांच-सात वर्षों से सेंटीमीटरों में बर्फ गिर रही है। इसका ग्लेशियरों पर दोहरा दबाव पड़ रहा है। एक तो बर्फ न पड़ने या कम पड़ने से बर्फ की कमी तथा दूसरा तापमान बढ़ने से बर्फ का अधिक पिघलना। बर्फ कम पड़ने का एक ज्वलंत उदाहरण कुल्लू और लाहौल-स्पीति को जोड़ने वाला दर्रा ‘रोहतांग’ है जो नवंबर से मार्च तक पैदल तक के लिए भी बंद रहता था, वर्ष 2000-2001 में फरवरी के अंत तक जीपें आदि चलती रहीं।

प्रभाव— ज़रिमों या ग्लेशियरों के खत्म या कम होने के कारण हिमालय क्षेत्र, विशेषकर अध्ययन अधीन क्षेत्रों लाहौल तथा पांगी, पर बहुत अधिक विपरीत प्रभाव पड़े हैं और भविष्य में इससे भी अधिक कुप्रभाव पड़ने की पूरी संभावनाएं हैं जिनमें कुछ निम्नलिखित हैं:
1.      पानी की कमी- ज़रिम या ग्लेशियरों के खत्म होने या कम होने से क्षेत्र में पानी की कमी हो रही है जिंसके कारण भूतकाल में भी कई-कई गांव उजड़ चुके हैं और आज भी कई गांवों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो चुका है। क्योंकि क्षेत्र की कृषि पूर्ण रूप से सिंचाई पर आधारित है, अत: इस पर भविष्य में अत्यधिक कुप्रभाव पड़ने की संभावना है। इस प्रकार के पानी की कमी के चलते कृषि तो खत्म हो ही जाएगी मनुष्य, जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों का अस्तित्व तक भी खत्म हो सकता है। क्योंकि पहाड़ों में जमीन के नीचे से पानी की संभावना नगण्य है, अत: पानी स्त्रोत सिर्फ चश्मा या नाला हो सकता है, जो ग्लेशियर या ज़रिम पर निर्भर करते हैं। दो वर्ष पहले हिमाचल सरकार के सिंचाई एवं जन-स्वास्थ्य विभाग ने अपनी आदतानुसार गाँव जाहलमां (लाहौल) में मशीनों द्वारा खुदाई करके पानी निकालने की (असंभव) कोशिश की और तीन दिन की लगातार खुदाई के बाद असफल होकर काम बंद करना पड़ा।
2.      चश्मों का सूखना- एक अध्ययन के अनुसार गत 50 वर्षों में इस क्षेत्र के 60-70 प्रतिशत चश्मे सूख चुके हैं।
3.      नालों के जलस्तर का गिरना- गत 20-25 वर्षों में ग्लेशियर के घटने के कारण नालों का जल-स्तर घटा है, कारणवश कई नहरों में पानी आना बंद हो गया है।
4.      बाढ़ का आना- ग्लेशियरों या ज़रिमों के तेजी से पिघलने के कारण नालों में पानी बढ़ जाता है, जिसके कारण बाढ़ की स्थिति पैदा होती है और भूकटाव की समस्या पैदा हो रही है।
5.      पेड़-पौधों का सूखना- गत कुछ वर्षों से इन क्षेत्रों, विशेषकर लाहौल में एक बहुद्देशीय पेड़ विल्लो बड़े पैमाने पर सूख रहा है। अभी कुछ दिन पहले पढ़ने को मिला कि लाहौल, पांगी तथा जम्मू-कश्मीर के वनों में ‘कायल’ के वन काफी मात्रा में सूख रहे हैं।
6.      आय में कमी- ग्लेशियरों के खत्म होने या कमी से नालों तथा चश्मों के पानी में कमी आई है। कारणवश सिंचाई नहीं हो सकी। इसके परिणामस्वरूप फसलों में कमी आई और फसलों में कमी के कारण यहां के लोगों की आय में भी बहुत कमी आई है और बेरोजगारी की स्थिति पैदा हो गई है।
7.      सरकारी संसाधनों पर दबाव- इस प्रकार इन क्षेत्रों में सूखे की स्थिति हो जाने से हर वर्ष सरकार को सहायता के तौर पर बहुत-सी वित्तीय मदद देनी पड़ रही है। सरकार ने लाहौल में ईंधन की पूर्ति हेतु डिपो खोल रखे हैं और सिर्फ एक डिपो में हर वर्ष 11 लाख रुपये की सब्सिडी सिर्फ ईंधन पर देनी पड़ती है और सिर्फ लाहौल में इस प्रकार के चार डिपो हैं। इस प्रकार इस पूरे क्षेत्र में हर वर्ष सरकार को करोड़ों रुपये की अनुत्पादक सब्सिडी देनी पड़ रही है। 1998 में लाहौल में ईंधन की पक्की व कच्ची लकड़ी पर क्रमश: 366 और 357 रुपये प्रति क्विंटल की दर से सब्सिडी दी गई थी।
8.      जल विद्युत परियोजनाओं पर प्रभाव- ग्लेशियरों के खत्म होने या कम होने से नदियों तथा नालों में पानी कम हो जाएगा, जिसका सीधा प्रभाव जल-विद्युत परियोजनाओं पर पड़ेगा। इससे जहां ऊर्जा संकट पैदा होगा, वहीं राज्य और देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा। हिमाचल प्रदेश जैसा राज्य जो अपनी भविष्य कि अर्थव्यवस्था का आधार जल विद्युत उत्पादन को बनाना चाहता है, पर तो और अधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

समाधान- भविष्य के इस संकट से निपटने के लिए राष्ट्र को समर्पित संस्था सद्प्रयास सुझाव स्वरूप चार परियोजनाएं प्रस्तावित करती है। हर परियोजना के अंतर्गत कई-कई कार्य योजनाएं शामिल की गई हैं। पहली परियोजना है हिम एवं जल प्रबंधन जिसके अंतर्गत चार कार्य योजनाएं शामिल हैं 1. ग्लेशियर के कम होने या खत्म होने को रोकने की दिशा में कार्य करना। 2. ‘स्नो हार्वेस्टिंग’ तथा ‘वाटर हार्वेस्टिंग’ पर कार्य करना। 3. वनीकरण का कार्य करना। स्थानीय प्रजातियों विल्लो छरमा तथा नई प्रजातियों को लगाना। सिर्फ डंडे गाड़ना ही वनीकरण नहीं अपितु घास, झाड़ियों, चौड़ी पत्ती के पेड़ आदि को लगाना भी शामिल हो। 4. चारागाहों का विकास करना।

दूसरी परियोजना है ग्लेशियर और जल के प्रति जन-जागृति लाना जिसके अंतर्गत तीन कार्य योजनाएं शामिल है 1. आम आदमी के अंदर खत्म हो रहे आत्मविश्वास तथा ज़िम्मेदारी की भावना को जीवित करना। उसको यह समझाना कि देश और समाज उसका है, सरकार का नहीं। 2. जनजातीय लोगों (लाहौल-स्पीति, पांगी आदि) के मन-मस्तिष्क में यह विश्वास पैदा करना कि आरक्षण और सब्सिडी के बिना भी जिंदा रहा जा सकता है और अधिक सम्मान, ज़िम्मेदारी और आत्मविश्वास से जीया का सकता है। पर्यावरण तथा पारिस्थितिकीय संतुलित विकास के लिए कार्य करना। 3. प्रकृति और मानव के बीच तालमेल बढ़ाना।

तीसरी परियोजना है नई फसलों पर शोध जिसमें दो कार्य योजनाओं को शामिल किया गया है। 1. ऐसी फसलों को उगाने की दिशा में कार्य (शोध) करना जो कम पानी मांगते हैं। 2. जमीन की नमी को बनाए रखने वाले पेड़-पौधों को उगाने की दिशा में कार्य करना।

चौथी परियोजना है आत्मनिर्भर एवं टिकाऊ समाज-आर्थिक समाधान पर कार्य करना जिसके अधीन चार कार्य योजनाएं अति हैं 1. क्षेत्र की अर्थव्यस्था को नया आयाम देना। 2. सामाजिक, आर्थिक स्थिति में बदलाव लाना। 3. सब्सिडी पर निर्भरता कम करना और सरकारी खजाने को राहत देना। वर्तमान विकास के मॉडल, जिसमें सीमेंट और कंकरीट के जंगल उगाने के स्थान पर टिकाऊ और पर्यावरण मित्र नीति, योजना-परियोजना तथा कार्यक्रमों को प्राथमिकता देना। 4. विकास की अवधारणा पर पुनर्विचार करना।

ल.च.ढिस्सा

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *