देश को एक ही रंग में रंगा देखने का सपना लिए हुओं को उत्तर पूर्व (उन्हीं की पार्टी के नेताओं) ने साफ संदेश दे दिया है कि उनके इस सपने को साकार करने में वे उनका साथ नहीं दे सकते। अब तो इस देश को एक भाषा, एक संस्कृति और एक (हिन्दू) राष्ट्र के रूप में देखने वालों को समझ आ जाना चाहिए कि यह देश उनके सामान्य ज्ञान से कहीं अधिक बड़ा है। उनका यह सपना कि ‘हिन्दू’, ‘हिन्दी’ ‘हिंदुस्तान’ शायद कभी पूरा न हो सके। जिस प्रकार से देश को फासीवाद की तरफ धकेला जा रहा था, वह पूरा होना असंभव है, इस देश में, जहां हज़ारों जातियां, प्रजातियां, धर्म, मत, भाषा/बोलियां, खान-पान पहरावे वाले लोगों का निवास है। कई रंगों के इस देश में कई अलग-अलग संस्कृतियां जीवित हैं, कई मत और मान्यताएं विद्यमान हैं, कई पद्यतियां और विश्वास-आस्थाएं स्थापित हैं।

विकास और उत्तरोतर आगे बढ़ने के नाम पर सत्ता हथिया कर, पथ विचलित हो जाना कुछ समय के लिए तो संभव हो सकता है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं। हाल में हुए चुनावों विशेषकर उत्तर प्रदेश को लेकर जीतने वालों को अति उत्साहित होने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि आज भी उनका प्राप्त वोट 50% से नीचे ही है। इटली, जर्मनी की तरह यदि इस देश में फासीवाद का विकास होना होता तो सत्तासीन पार्टी को 50% से अधिक मत सिर्फ उसके हिंदुत्ववाद या राष्ट्रवाद के ऊपर मिलते, उसे अन्य तरह के छल-प्रपंच, जोड़-तोड़, सत्य-असत्य जैसे ‘कब्रिस्तान-श्मशान’ तक का सहारा नहीं लेना पड़ता।

उसके अलावा भी तमाम देश जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व, आदिवासी समुदाय सब के सब उनके लिए आतंकवादी हैं और कश्मीर में तो उन्हें ‘युद्ध जैसे हालात लगते हैं’, इस तरह की घोषणाएं करने की आदत और मजबूरी है। उत्तर पूर्व से उन्हें साफ संदेश मिल गए हैं कि ‘डायटरी कोड’ और ‘ड्रेस कोड’ जैसे कृत्य देश की विविधता के लिए खतरा है। इसे सम्पूर्ण देश का संदेश समझना चाहिए।

 

लाल चंद ढिस्सा

पूर्व आईसीएस (IAS) व सामाजिक कार्यकर्ता

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