वन कटते गए
वन कटते गए
धरती नंगी होती गई
पत्थर, लोहे, सीमेंट
और कंकरीट की संस्कृति
फैलती गई।
कल तक जो धरती
वस्त्र-आभूषणों से
सजी हुई थी
आज वह सूनी हो गई।
धरती मां के तन से
एक-एक कर
वस्त्र उतरते गए
वह नंग धड़ंग
चौराहे पर खड़ी कर दी गई।
एक के बाद एक
हर गहना
बाजार में
बिकने के लिए
पहुंचता गया।
मानव के मन में
स्वार्थ, लालच और
मोह बढ़ता गया
प्रकृति का रंग
बदरंग होता गया।
चांदी के चंद
सिक्कों के खातिर
मानव हरी भरी
धरती को
श्मशान में बदलता गया।
वृक्ष कटते गए
बाढ़ आती गई
धरती कट-2 कर
मनुष्य भूखा मरता गया।
इंसान सभ्य होता गया
हैवानियत, स्वार्थ और
दौलत की भूख भी
बढ़ती गई
दया, मानवता खत्म होती गई।
विकास के नाम पर
पर्यावरण-प्राकृतिक परिवेश का
सबसे बड़ा शत्रु बन
उसका सर्वनाश
करता गया।
वृक्ष के तन पर
कुल्हाड़ी के हर बार पर
कुदरत के मुंह से
आह निकलती गई;
और यह आह
मानव जाति के लिए
श्राप बनती गई।
यही श्राप असंतोष
अशांति और अहं का
विकराल रूप धरता गया
और मनुष्य को अपना
शिकार बनाता गया।
लाल चंद ढिस्सा